इंदौर। देश के स्वच्छ शहर इंदौर की पहचान केवल साफ-सफाई और विकास से नहीं, बल्कि यहां आने वाले मेहमानों को मिलने वाली सुविधाओं और व्यवहार से भी बनती है,लेकिन रेलवे स्टेशन के बाहर उतरते ही यदि यात्रियों का सामना ऑटो चालकों की चिल्ला-पुकार, सवारी को अपने वाहन में बैठाने की प्रतिस्पर्धा और किराए को लेकर असमंजस से हो, तो शहर की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। रेलवे स्टेशन किसी भी शहर का प्रमुख प्रवेश द्वार होता है। दूसरे शहरों से आने वाले यात्री, परिवार, बुजुर्ग और महिलाएं स्टेशन से बाहर निकलते ही अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा का सहारा लेते हैं। ऐसे में उन्हें सहज, सुरक्षित और पारदर्शी परिवहन सुविधा मिलना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन यात्रियों को लेकर ऑटो चालकों के बीच होने वाली खींचतान और आवाज लगाकर सवारी बुलाने की स्थिति कई बार यात्रियों के लिए असुविधाजनक बन जाती है।
*जितनी दूरी, उतना किराया—व्यवस्था क्यों नहीं?*-
सवाल यह है कि ऑटो रिक्शा का संचालन मीटर आधारित क्यों नहीं हो सकता? यात्री जहां जाना चाहता है, वहां तक की दूरी के अनुसार किराया तय हो और भुगतान भी उसी आधार पर हो। इससे न यात्री को किराए को लेकर मोलभाव करना पड़ेगा और न ही बाहर से आने वाले व्यक्ति को यह आशंका रहेगी कि उससे अधिक पैसे मांगे जा रहे हैं। यदि किसी मार्ग पर मीटर आधारित व्यवस्था लागू करने में व्यावहारिक कठिनाइयां हैं, तो प्रशासन निर्धारित किराया सूची, डिजिटल किराया प्रणाली या प्रीपेड ऑटो काउंटर जैसी वैकल्पिक व्यवस्था लागू कर सकता है। उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए । यात्री को सुविधा मिले और ऑटो चालक को भी पारदर्शी तरीके से सवारी उपलब्ध हो।
*कतार में ऑटो, व्यवस्थित तरीके से सवारी*-रेलवे स्टेशन के बाहर ऑटो रिक्शा के लिए निर्धारित कतार, यात्रियों के चढ़ने-उतरने का निश्चित स्थान और गंतव्य के अनुसार सवारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे ऑटो चालकों के बीच अनावश्यक प्रतिस्पर्धा कम होगी, स्टेशन के बाहर यातायात सुचारु रहेगा और यात्रियों को भी अपनी सुविधा के अनुसार वाहन चुनने का अवसर मिलेगा।
इसके लिए परिवहन विभाग, यातायात पुलिस, रेलवे प्रशासन और जिला प्रशासन के बीच समन्वय जरूरी है। नियम बनाना ही पर्याप्त नहीं, उनका नियमित पालन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
*प्रशासन की नजर इस पर क्यों नहीं?*-इंदौर स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में अपनी पहचान बना चुका है। अब जरूरत ऐसी नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने की है, जिनका अनुभव शहर में कदम रखते ही होता है। रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले यात्री के लिए पहली सार्वजनिक परिवहन सुविधा ही शहर के प्रति उसकी धारणा बनाती है। प्रशासन को यह देखना होगा कि स्टेशन के बाहर ऑटो संचालन की व्यवस्था यात्रियों की सुविधा के अनुरूप है या नहीं। यदि व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश है, तो उसे दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। सवाल ऑटो चालकों की रोजी-रोटी का नहीं, व्यवस्था और अनुशासन का है। ऑटो चालक सम्मानजनक तरीके से अपना व्यवसाय करें और यात्री भी उचित किराए पर सुरक्षित सफर कर सके , दोनों उद्देश्य एक साथ पूरे हो सकते हैं। जरूरत केवल ऐसी व्यवस्था लागू करने की है, जिसमें प्रतिस्पर्धा चिल्ला-पुकार से नहीं, बल्कि बेहतर सेवा से हो।